जौहरी उल्लेख गजल



संघर्ष वो जौहरी है  जो हमारे अंदर छिपे हिरे को तसता  है ।


मुझे गम में देख कर, गमगीन मत समझ लेना,

मैं वो चीज हूं जिसे पाकर, जौहरी हीरे को भूल जाता है..!



सच्चा है वो उसका दिल बहुत भोला है।

हिरे को तो बस जौहरी ने तोला है।।

तुम क्या समझोगे उसके जसबातो से दूर हो।

न जाने किस नसे में चूर हो।।

तुम कोई जौहरी नही बस एक मजदूर हो।

खुद के चाहने वालो से बहुत दूर हो।।

माना कि तुम कोई हूर हो।

पर आखिर किस नसे में चूर हो।।

बहुत दूर,, बहुत दूर,, बहुत दूर,,


बहुत आये जौहरी हीरा खोजने।
उन्हें पत्थर मिला न कोई।।
फिर आया कोई पत्थर खोजने।
मुझे हीरा समझ लिया कोई।।

जब तक तक पहुचे जौहरी तक ,
कही ये हीरा पत्थर न हो जाये ,
ए खुदा तू बता , क्या सच बोलू ?
कही ये जुबां कड़वी ना हो जाए ।।...

रेशम सी हवाये ,

मखमल सी बादल ,
चाँदी सी बिजली ,
मोती सी बूंदे....
मौसम मानो मौसम नही ,
कोई जौहरी का दुकान हो गया हो...!


कैसे बने पल में तोला पल में माशा ,
फितरत मेरी इतनी दोहरी नही ,
तुम हीरा हो !... तो होंगे हुजूर ,
मलाल ये है कि हम जौहरी नही ।।


मदारी यह हर कोई है ,
जो करतब  दिखलाते है ,
पर जौहरी यहा कितने हैं ,
जो हुनर तरासते है !?


राज आर्ट्स


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